Friday, 13 May 2011

गुलज़ार साहब के लिए



आपसे मिल सका तो ये कहूँगा

अच्छा हुआ के आपसे दिल्ली में मुलाक़ात हुई
दिल्ली से आपका-हमारा कोई वास्ता तो है
वैसे तो कोई ज़ाती पहचान नहीं है फिर भी
पुरानी सब्ज़ी मंडी से गुज़रता मेरा रास्ता तो है


उस रास्ते से गुज़रने के बहाने ढूंढ लेता हूँ
सीधे रस्ते से ना आने के बहाने ढूंढ लेता हूँ
गुलज़ार साहब यहीं रहते थे बेटा
अपनी बेटी को ये बतलाने के बहाने ढूंढ लेता हूँ


जहां से आई थी सदा के काबे से पर्दा ना उठाया जाए
वहीं ग़ालिब का बुत लगा था और आप आए थे  
वैसे तो वजह कुछ खास नहीं थी लेकिन
मैंने सोचा कि चश्मा इस बार बल्लीमारान से बनवाया जाए


ऐसी पहचान तो नहीं के पुराने दोस्त हों फिर भी
दिल्ली और हमारा ये रिश्ता अजीब सा तो है
"वो हैं ना अपने गुलज़ार साहब" कहता हूँ जब दोस्तों से
ये झूठ झूठ सही सच के करीब सा तो है

3 comments:

  1. oho... toh ishq iss taraf bhi barabar hai :) Behtareen kavita!!! Gulzar sahab ko ye zarur sunaiye!

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  2. Thanks Nihal. Maine ye kavita Gulzar sahab ko de di thi. Ummeed hai unhone padh li hogi :)

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